Rupee falls 91 against dollar-
एक वक्त था जब खबरों में रोज पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम छाए रहते थे। तब एक मजाक मशहूर हुआ था कि “पेट्रोल महंगा हो गया तो क्या, मैं तो पहले भी 100 का तेल डलवाता था और अब भी 100 का ही डलवाता हूं।” आज पेट्रोल-डीजल की जगह गिरता हुआ रुपया चर्चा में है और वही मजाक अब रुपये पर दोहराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि “रुपया गिरे तो क्या, तनख्वाह भी रुपये में मिलती है और खर्च भी रुपये में ही होता है।” लेकिन सच यही है कि यह तर्क भी उतना ही खोखला है, जितना पेट्रोल वाला मजाक था।
हकीकत यह है कि रुपया लगातार नई निचाई बना रहा है और डॉलर के मुकाबले 91 के पार निकल चुका है। सवाल यही है कि आखिर रुपया इतना क्यों गिर रहा है, इसका असर आम आदमी पर क्या पड़ रहा है और सबसे बड़ा सवाल—क्या कहीं जाकर यह गिरावट रुकेगी?

क्या वाकई कभी 1 रुपया = 1 डॉलर था?
सोशल मीडिया पर वायरल मीम्स में दावा किया जा रहा है कि 1947 में 1 रुपया, 1 डॉलर के बराबर था। लेकिन यह दावा पूरी तरह गलत है। कोई भी सरकारी या ऐतिहासिक आंकड़ा इसकी पुष्टि नहीं करता। थॉमस कुक के फॉरेन एक्सचेंज डेटा के मुताबिक आज़ादी के वक्त 1 डॉलर की कीमत करीब 3 रुपये 30 पैसे थी। यानी मजाक में भी कभी रुपया डॉलर के बराबर नहीं रहा।
1947 से 2025 तक रुपये की गिरावट की कहानी
भारत की आज़ादी के समय 1 डॉलर = 3.31 रुपये था। 1966 में आर्थिक संकट के दौरान रुपये का बड़ा अवमूल्यन हुआ और डॉलर 7.50 रुपये तक पहुंच गया। 1991 में उदारीकरण के बाद पहली बार डॉलर 20 रुपये के पार गया। 2000 से 2010 तक डॉलर 40–50 रुपये के बीच स्थिर रहा, लेकिन 2012 के बाद गिरावट तेज हो गई। नतीजा यह हुआ कि 2025 के अंत तक डॉलर 91 रुपये के पार पहुंच गया, जो रुपये का अब तक का सबसे निचला स्तर है।
रुपया क्यों गिर रहा है? जानिए 5 बड़े कारण
विदेशी निवेशकों की बिकवाली (FPI Outflow):
विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालकर अमेरिका जैसे सुरक्षित बाजारों में लगा रहे हैं। जब वे भारत से पैसा निकालते हैं तो रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। 2025 में ही करीब 18 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील में अनिश्चितता:
अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ और ट्रेड डील को लेकर असमंजस ने बाजार में डर पैदा किया है। इस अनिश्चितता की वजह से रुपया एशियाई करेंसी में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वालों में शामिल हो गया है।
बढ़ता आयात बिल:
भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में सोना आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने से ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे रुपया कमजोर हो रहा है।
RBI की रणनीति:
इस बार रिजर्व बैंक ने रुपये को पूरी तरह बचाने के बजाय बाजार के हवाले छोड़ा है, ताकि निर्यातकों को फायदा मिल सके। इससे रुपये पर गिरावट का दबाव बना हुआ है।
वैश्विक अस्थिरता:
रूस-यूक्रेन युद्ध, मिडिल ईस्ट तनाव और अमेरिकी नीतियों ने डॉलर को मजबूत किया है, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ा है।


आम आदमी पर रुपये की गिरावट का असर
रुपया कमजोर होते ही विदेश से आने वाली हर चीज महंगी हो जाती है। कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है, इसलिए डॉलर महंगा तो पेट्रोल-डीजल महंगा। पेट्रोल-डीजल महंगा तो दूध, सब्जी, गैस सिलिंडर और रोजमर्रा का सामान भी महंगा। मोबाइल फोन, गैजेट्स और विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों की फीस भी बढ़ जाती है। यानी रुपये की गिरावट सीधा आपकी जेब पर असर डालती है।
किसे फायदा हो रहा है?
रुपये की कमजोरी से फायदा उन्हें होता है, जो विदेश में नौकरी कर रहे हैं या भारत में रहते हुए डॉलर में सैलरी पाते हैं। डॉलर महंगा होने से उनकी कमाई रुपये में ज्यादा हो जाती है।

आगे क्या? रुपया कहां जाकर रुकेगा?
इस सवाल का सटीक जवाब किसी के पास नहीं है। अगर भारत-अमेरिका ट्रेड डील भारत की शर्तों पर फाइनल हो जाती है, तो रुपये में सुधार आ सकता है। लेकिन अगर हालात ऐसे ही रहे तो अगले साल की शुरुआत में डॉलर 92 रुपये के पार भी जा सकता है। हालांकि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का अनुमान है कि 2026 में रुपया मजबूत होकर 87 रुपये प्रति डॉलर तक लौट सकता है।

